चाणक्यनीतिः
Chanakya Niti
Aphorisms from the architect of the Mauryan Empire covering statecraft, education, family, and social behaviour. Blends pragmatic realpolitik with dharmic caution, making it one of India's most quoted repositories of practical wisdom.
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Subhashitams
Subhashitams from this grantha
कामधेनुगुणा विद्या ह्यकाले फलदायिनी । प्रवासे मातृसदृशी विद्या गुप्तं धनं स्मृतम् ॥
विद्या में कामधेनु जैसे गुण हैं — विपरीत समय में भी फल देती है। परदेश में माता के समान रक्षा करती है — विद्या छिपा हुआ धन कहलाती है।
को हि भारः समर्थानां किं दूरं व्यवसायिनाम् । को विदेशः सुविद्यानां कः परः प्रियवादिनाम् ॥
सामर्थ्यवान के लिए क्या भारी? परिश्रमी के लिए क्या दूर? विद्वान के लिए कौन-सा देश पराया? मधुर बोलने वाले के लिए कौन पराया है?
रूपयौवनसम्पन्ना विशालकुलसम्भवाः । विद्याहीना न शोभन्ते निर्गन्धाः किंशुका यथा ॥
रूप और यौवन से संपन्न तथा उच्च कुल में जन्मे होने पर भी, विद्याहीन व्यक्ति शोभा नहीं पाते — जैसे किंशुक के फूल सुंदर दिखते हैं पर गंधहीन होते हैं।
लालयेत् पञ्च वर्षाणि दश वर्षाणि ताडयेत् । प्राप्ते तु षोडशे वर्षे पुत्रे मित्रवदाचरेत् ॥
पाँच वर्ष तक लाड़-प्यार करें, अगले दस वर्ष तक अनुशासन में रखें; परन्तु सोलहवें वर्ष में प्रवेश करने पर पुत्र से मित्र के समान व्यवहार करें।
निर्विषेणापि सर्पेण कर्तव्या महती फणा । विषमस्तु न चापि अस्तु फणाटोपो भयंकरः ॥
निर्विष सर्प को भी बड़ी फणा फैलानी चाहिए। विष हो अथवा न हो — फण का विस्तार ही भयंकर होता है।
विषादपि अमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् । अमित्रादपि सद्वृत्तं अमेध्यादपि काञ्चनम् ॥
विष में से भी अमृत ग्रहण करना चाहिए; बालक से भी सुभाषित; शत्रु से भी सदाचार; और अपवित्र स्थान से भी सुवर्ण।