महाभारतम्
Mahabharata
The world's longest epic narrating the dynastic conflict between the Pandavas and Kauravas. An encyclopaedia of dharma containing the Bhagavad Gita, Yaksha Prashna, and Vidura Niti among its 100,000 verses.
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Subhashitams
Subhashitams from this grantha
आहारनिद्राभयमैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् । धर्मो हि तेषामधिको विशेषः धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥
आहार, निद्रा, भय और सन्तानोत्पत्ति — ये पशुओं और मनुष्यों दोनों में समान हैं। धर्म ही मनुष्य की विशेषता है; धर्म के बिना मनुष्य पशु के समान है।
धारणात् धर्म इत्याहुः धर्मो धारयति प्रजाः । यः स्यात् धारणसंयुक्तः स धर्म इति निश्चयः ॥
जो एकता में बाँधता है उसे धर्म कहते हैं। धर्म प्रजा को धारण करता है। जिसमें सबको जोड़ने की शक्ति हो — वही निश्चित रूप से धर्म है।
उत्थानेनामृतं लब्धमुत्थानेनासुरा हताः । उत्थानेन महेन्द्रेण श्रैष्ठ्यं प्राप्तं दिवीह च ॥
प्रयास से ही देवताओं ने अमृत प्राप्त किया, प्रयास से ही असुर मारे गए। प्रयास से ही इन्द्र ने स्वर्ग और पृथ्वी पर श्रेष्ठता पाई।
परैः परिभवे प्राप्ते वयं पञ्चोत्तरं शतम् । परस्परविरोधे तु वयं पञ्च शतं तु ते ॥
बाहरी शत्रु से अपमान होने पर हम नूट पाँच हैं। परन्तु आपस में लड़ें तो हम पाँच हैं और वे सौ।
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा । सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ॥
उदय में सूर्य रक्त (लाल) है और अस्त में भी। सम्पत्ति और विपत्ति दोनों में महान लोगों की एकरूपता रहती है।
यस्मिन्यथा वर्तते यो मनुष्यः तस्मिंस्तथा वर्तितव्यं स धर्मः । मायाचारो मायया वर्तितव्यः साध्वाचारः साधुना प्रत्युदेयः ॥
जो मनुष्य जिसके साथ जैसा व्यवहार करता है, उसके साथ वैसा ही व्यवहार करना चाहिए — यही धर्म है। छल से व्यवहार करने वाले के साथ छल से, और साधु आचरण वाले के साथ साधुता से पेश आना चाहिए।
अहन्यहनि भूतानि गच्छन्ति यमालयम् । शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥
प्रतिदिन प्राणी यम के घर जाते हैं — फिर भी बचे हुए अनन्तकाल जीने की इच्छा रखते हैं। इससे बड़ा आश्चर्य और क्या है?
धर्मं यो बाधते धर्मो न स धर्मः कुधर्मकः । अविरोधात्तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रम ॥
हे सत्यविक्रम! जो धर्म दूसरे धर्म को बाधा पहुँचाए, वह धर्म नहीं — वह तो कुधर्म है। अविरोधपूर्वक जो धर्म हो, वही सच्चा धर्म है।
धारणाद्धर्ममित्याहु र्धर्मो धारयति प्रजाः । यत्स्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः ॥
धारण करने के कारण इसे धर्म कहते हैं — धर्म प्रजाओं को धारण करता है। जो भी धारण करने की शक्ति से युक्त हो, वही निश्चित रूप से धर्म है।
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् । देवा भागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते ॥
संगच्छध्वम् (साथ चलो), संवदध्वम् (मिलकर बोलो), मनों को जानो। जैसे पूर्वकाल में देवताओं ने जानकर कार्य किया।