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SubhashitaSubhashita Sangraha (grand anthology)

महासुभाषितसंग्रहः

Mahasubhashita Sangraha

Compiled by B.B. Chaudhuri et al.20th Century CE (traditional content)Subhashita Sangraha (grand anthology)

A monumental modern compilation of Sanskrit aphorisms drawn from hundreds of classical texts. Preserves countless subhashitas from oral tradition across topics from generosity and power to cosmic order — a standard academic reference.

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Subhashitams

Subhashitams from this grantha

गौरवं प्राप्यते दानात्
न तु वित्तस्य सञ्चयात् ।
स्थितिरुच्चैः पयोदानां
पयोधीनामधः स्थितिः ॥

गौरव दान देने से प्राप्त होता है, धन संचय करने से नहीं। वर्षा देने वाले बादल ऊँचाई पर रहते हैं; जल संचय करने वाले सागर नीचे रहते हैं।

generosity · givingView
अकारणं व्याकरणं तन्त्रीशब्दोऽप्यकारणम् ।
अकारणं त्रयो वेदास्तण्डुलास्तत्र कारणम् ॥

व्याकरण का कोई मतलब नहीं, वीणा की ध्वनि का कोई मतलब नहीं, तीनों वेदों का कोई मतलब नहीं — भूखे को तो बस चावल से मतलब है।

practicality · humourView
अकिञ्चनत्वं राज्यं च तुलया समतोलयत् ।
अकिञ्चनत्वमधिकं राज्यादपि जितात्मनः ॥

निर्धनता और राज्य को जब तराजू पर तौला गया, तो जिसने अपने मन को जीत लिया है उसके लिए निर्धनता राज्य से भी बड़ी निकली।

detachment · self-masteryView
अकृतप्रेमैव वरं न पुनः सञ्जातविघटितप्रेमा ।
उद्धृतनयनस्ताम्यति यथा हि न तथेह जातान्धः ॥

प्रेम न हुआ हो तो अच्छा, बजाय इसके कि प्रेम हो और फिर टूट जाए — जैसे जन्म से अन्धे को उतना कष्ट नहीं होता जितना उसे होता है जिसकी आँखें निकाल ली जाएँ।

love · lossView
अर्थी करोति दैन्यं लब्धार्थो गर्वमपरितोषं च ।
नष्टधनोऽस्ति सशोकः सुखमास्ते निःस्पृहः पुरुषः ॥

धन चाहने वाला दीन हो जाता है, पाने वाला घमण्डी और असन्तुष्ट, खोने वाला शोकग्रस्त — सुखी तो केवल निस्पृह व्यक्ति रहता है।

desire · contentmentView
अश्वं नैव गजं नैव
व्याघ्रं नैव च नैव च ।
अजापुत्रं बलिं दद्यात्
देवो दुर्बलघातकः ॥

न घोड़े की बलि दी जाती है, न हाथी की, न बाघ की — केवल बकरे के पुत्र (मेमने) की बलि दी जाती है। ईश्वर भी दुर्बल को ही मारता है।

power · weaknessView
अङ्गेन गात्रं नयनेन वक्त्रं
न्यायेन राज्यं लवणेन भोज्यं ।
धर्मेण हीनं खलु जीवितं च
न राजते चन्द्रमसा विना निशा ॥

शरीर की शोभा अंगों से है, मुख की शोभा नेत्रों से है, राज्य की शोभा न्याय से है, और भोजन की शोभा नमक से है। निश्चय ही धर्महीन जीवन शोभा नहीं पाता — जैसे चंद्रमा के बिना रात्रि।

dharma · wisdomView