सुभाषितरत्नावली
Subhashita Ratnavali
A classical Sanskrit anthology collecting hundreds of aphoristic verses from Vedic, Puranic, and independent traditions covering education, ethics, heroism, and governance. Served as a standard educational text transmitting classical values across generations of Sanskrit students.
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Subhashitams
Subhashitams from this grantha
न चौरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी । व्यये कृते वर्धते एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् ॥
इसे चोर चुरा नहीं सकते, राजा छीन नहीं सकता, भाइयों में बँट नहीं सकता, और उठाने में भारी भी नहीं। खर्च करने पर बढ़ता ही है — विद्या का धन सबसे श्रेष्ठ धन है।
अग्निः शेषं ऋणः शेषं शत्रुशेषं तथैव च । पुनः पुनः प्रवर्धेत तस्मात् शेषं न कारयेत् ॥
आग की शेष, ऋण की शेष, और शत्रु की शेष — ये बार-बार बढ़ती हैं। इसलिए इन्हें कभी शेष न रहने दो।
अमन्त्रमक्षरं नास्ति नास्ति मूलमनौषधम् । अयोग्यः पुरुषो नास्ति योजकस्तत्र दुर्लभः ॥
ऐसा कोई अक्षर नहीं जो मन्त्र न हो, ऐसी कोई जड़ी नहीं जो औषधि न हो, ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो अयोग्य हो — दुर्लभ तो वह है जो इन्हें पहचानकर काम में लाए।
नरस्याभरणं रूपं रूपस्याभरणं गुणाः । गुणस्याभरणं ज्ञानं ज्ञानस्याभरणं क्षमा ॥
सुन्दरता मनुष्य का आभूषण है, गुण सुन्दरता का आभूषण है, ज्ञान गुणों का आभूषण है, और क्षमा ज्ञान का आभूषण है।