( कलश को हल्दी, कुंकुम और चंदन से सजाएँ, जल भरकर ऊपर फूल रखें — फिर उसका जल पूजा सामग्री, मूर्ति और अपने सिर पर छिड़कें। )
कलश के मुख में विष्णु, कंठ में रुद्र, मूल में ब्रह्मा और मध्य में मातृगण विराजमान हैं — गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी इस जल में उपस्थित हों।
ॐ श्री महागणाधिपतये नमः । ध्यानावाहनादि षोडशोपचार पूजां करिष्ये ।
( हल्दी से एक छोटा गणपति बनाकर पान के पत्ते पर रखें, ध्यान करें, फिर फूल, अक्षत और गुड़ अर्पित करें। )
प्राण प्रतिष्ठा एवं षोडशोपचार पूजा
मुख्य गणेश मूर्ति की 16-चरण पूजा
1.ॐ श्री वरसिद्धि विनायकाय नमः ध्यायामि ।
ध्यानम् — ध्यान करना
2.ॐ श्री वरसिद्धि विनायकाय नमः आवाहयामि ।
आवाहनम् — आवाहन करना
3.ॐ श्री वरसिद्धि विनायकाय नमः आसनं समर्पयामि ।
आसनम् — आसन अर्पण
4.ॐ श्री वरसिद्धि विनायकाय नमः पाद्यं समर्पयामि ।
पाद्यम् — पैर धोना
5.ॐ श्री वरसिद्धि विनायकाय नमः अर्घ्यं समर्पयामि ।
अर्घ्यम् — हाथों हेतु जल अर्पण
6.ॐ श्री वरसिद्धि विनायकाय नमः आचमनीयं समर्पयामि ।
आचमनीयम् — आचमन हेतु जल
7.ॐ श्री वरसिद्धि विनायकाय नमः स्नानं समर्पयामि ।
स्नानम् — स्नान कराना
8.ॐ श्री वरसिद्धि विनायकाय नमः वस्त्रयुग्मं समर्पयामि ।
वस्त्रम् — वस्त्र अर्पण
9.ॐ श्री वरसिद्धि विनायकाय नमः यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।
यज्ञोपवीतम् — यज्ञोपवीत अर्पण
10.ॐ श्री वरसिद्धि विनायकाय नमः श्रीगन्धं समर्पयामि ।
गन्धम् — चंदन अर्पण
11.ॐ श्री वरसिद्धि विनायकाय नमः अक्षतान् समर्पयामि ।
अक्षतान् — अक्षत अर्पण
12.ॐ श्री वरसिद्धि विनायकाय नमः पुष्पाणि समर्पयामि ।
प्रत्येक नाम के साथ अक्षत अर्पित करें, या साथ में सुनें
1.ॐ विनायकाय नमः
2.ॐ विघ्नराजाय नमः
3.ॐ गौरीपुत्राय नमः
4.ॐ गणेश्वराय नमः
5.ॐ स्कन्दाग्रजाय नमः
6.ॐ अव्ययाय नमः
7.ॐ पूताय नमः
8.ॐ दक्षाय नमः
9.ॐ अध्यक्षाय नमः
10.ॐ द्विजप्रियाय नमः
11.ॐ अग्निगर्भच्छिदे नमः
12.ॐ इन्द्रश्रीप्रदाय नमः
13.ॐ वाणीप्रदाय नमः
14.ॐ अव्ययाय नमः
15.ॐ सर्वसिद्धिप्रदाय नमः
16.ॐ शर्वतनयाय नमः
17.ॐ शर्वरिप्रियाय नमः
18.ॐ सर्वात्मकाय नमः
19.ॐ सृष्टिकर्त्रे नमः
20.ॐ देवाय नमः
21.ॐ अनेकात्मकाय नमः
22.ॐ शिवप्रियाय नमः
23.ॐ शीघ्रकारिणे नमः
24.ॐ शाश्वताय नमः
25.ॐ बलाय नमः
26.ॐ बलोत्थिताय नमः
27.ॐ भवात्मजाय नमः
28.ॐ पुराणपुरुषाय नमः
29.ॐ पूष्णे नमः
30.ॐ पुष्करकृते नमः
31.ॐ पुण्यकृते नमः
32.ॐ रामप्रियाय नमः
33.ॐ रामभक्ताय नमः
34.ॐ रमापरिपूजिताय नमः
35.ॐ विघ्नकर्त्रे नमः
36.ॐ विघ्नहर्त्रे नमः
37.ॐ विश्वनेत्रे नमः
38.ॐ एकदन्ताय नमः
39.ॐ द्विदेहकाय नमः
40.ॐ चतुर्बाहवे नमः
41.ॐ त्रिविक्रमाय नमः
42.ॐ भक्ताय नमः
43.ॐ वरदाय नमः
44.ॐ विष्णुप्रियाय नमः
45.ॐ कुमारगुरवे नमः
46.ॐ अक्षोभ्याय नमः
47.ॐ प्रसन्नवदनाय नमः
48.ॐ मूषिकवाहनाय नमः
49.ॐ सिद्धिप्रदाय नमः
50.ॐ विघ्नराजाय नमः
51.ॐ लम्बोदराय नमः
52.ॐ शूर्पकर्णाय नमः
53.ॐ श्रीमते नमः
54.ॐ ब्रह्मणे नमः
55.ॐ विष्णवे नमः
56.ॐ शिवाय नमः
57.ॐ शान्ताय नमः
58.ॐ कान्तिमते नमः
59.ॐ गजाननाय नमः
60.ॐ वरप्रदाय नमः
61.ॐ महाकालाय नमः
62.ॐ महातपसे नमः
63.ॐ महोदराय नमः
64.ॐ महाबलाय नमः
65.ॐ हेरम्बाय नमः
66.ॐ विकटाय नमः
67.ॐ श्रीकराय नमः
68.ॐ सौम्याय नमः
69.ॐ भक्तवत्सलाय नमः
70.ॐ मुक्तिदाय नमः
71.ॐ निधिप्रदाय नमः
72.ॐ ज्ञानमुद्राय नमः
73.ॐ आनन्ददाय नमः
74.ॐ मायिने नमः
75.ॐ कामिने नमः
76.ॐ कपिलाय नमः
77.ॐ भास्कराय नमः
78.ॐ स्थूलतुण्डाय नमः
79.ॐ शुभदाय नमः
80.ॐ अनन्ताय नमः
81.ॐ हेरम्बाय नमः
82.ॐ चतुर्भुजाय नमः
83.ॐ रत्नगर्भाय नमः
84.ॐ जितकामाय नमः
85.ॐ यज्ञकाय नमः
86.ॐ जितक्रोधाय नमः
87.ॐ प्रसन्नात्मने नमः
88.ॐ निष्कलङ्काय नमः
89.ॐ सत्यधर्मिणे नमः
90.ॐ स्वच्छन्दाय नमः
91.ॐ सिद्धिदायिने नमः
92.ॐ सर्वज्ञाय नमः
93.ॐ सर्वोत्तमाय नमः
94.ॐ सत्यव्रताय नमः
95.ॐ नित्याय नमः
96.ॐ निर्विघ्नाय नमः
97.ॐ धर्मकृते नमः
98.ॐ दयाकराय नमः
99.ॐ विनायकाय नमः
100.ॐ सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः
101.ॐ श्री वरसिद्धिविनायकाय नमः
102.ॐ शिवसूनवे नमः
103.ॐ गणाध्यक्षाय नमः
104.ॐ मूषकवाहनाय नमः
105.ॐ विघ्ननाशकाय नमः
106.ॐ कामरूपिणे नमः
107.ॐ सर्वदेवमयाय नमः
108.ॐ श्री महाशक्ति पुत्राय नमः
विनायक व्रत कथा
संपूर्ण विनायक व्रत कथा — जन्म, गणाधिपत्यम्, चंद्र-शाप, स्यमंतकमणि एवं दमयंती की कथा
कथा लिपि
यह कथा क्यों कही जाती है — नैमिषारण्य में धर्मराज का प्रश्न
प्राचीन काल में धर्मराज ने अपने ही ज्ञातिजनों (कुटुंबियों) के छल से अपना राज्य और सारी संपत्ति खो दी। दुःखी होकर वे पत्नी और भाइयों सहित वनों में भटकते हुए अंततः नैमिषारण्य पहुँचे। वहाँ सूत महर्षि शौनक आदि मुनियों को पुराणों के रहस्य समझा रहे थे। धर्मराज ने विनम्रतापूर्वक निकट जाकर प्रार्थना की, "हे महर्षि! हमने अपना राज्य और सर्वस्व खो दिया है। क्या कोई ऐसा सरल व्रत है जो इन कष्टों को दूर कर हमें पुनः पूर्व वैभव प्रदान करे?" इस पर सूत मुनि ने एक पुरानी कथा सुनानी आरंभ की — एक बार कुमारस्वामी ने अपने पिता शिव से पूछा, "पिताजी! मनुष्यों को संतान-वृद्धि, इच्छा-सिद्धि तथा समस्त शुभता एवं विजय प्रदान करने वाला व्रत कौन सा है?" शिव ने उत्तर दिया, "पुत्र! विनायक व्रत ही सर्वश्रेष्ठ है — यही सर्व संपत्ति प्रदान करने वाला है।" यह व्रत भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को करना चाहिए, ऐसा बताते हुए सूत मुनि ने धर्मराज को इन्हीं कथाओं को सुनाना आरंभ किया।
गणेश का जन्म — गजमुख की प्राप्ति
प्राचीन काल में पार्वती स्नान करने जा रही थीं और चाहती थीं कि कोई उन्हें विघ्न न डाले, इसलिए उन्होंने अपने शरीर पर लगे उबटन (हल्दी के लेप) से एक बालक का रूप गढ़कर उसमें प्राण फूँके। उन्होंने उसे द्वार पर पहरेदार नियुक्त करते हुए कहा, "जब तक मैं वापस न आऊँ, किसी को भीतर मत आने देना," और स्नान करने चली गईं। कुछ ही समय बाद शिव वहाँ आ पहुँचे। बालक ने उन्हें पहले कभी नहीं देखा था, इसलिए माता की आज्ञा मानते हुए उसने उन्हें रोक दिया। "मैं पार्वती का पति हूँ, मुझे भीतर जाने दो," शिव ने कहा, परंतु बालक नहीं माना। क्रोधित शिव ने अपने त्रिशूल से बालक का सिर काट डाला। स्नान से लौटी पार्वती ने जब अपने पुत्र का निर्जीव शरीर देखा, तो वे फूट-फूटकर रोईं और क्रोधवश समस्त सृष्टि का विनाश करने की प्रतिज्ञा कर ली। भयभीत देवगण उन्हें मनाने लगे। पार्वती ने केवल इस शर्त पर शांत होना स्वीकार किया कि उनके पुत्र को पुनर्जीवित किया जाए और उसे समस्त देवताओं से पहले पूजे जाने का वरदान दिया जाए। शिव ने अपने गणों को यह आदेश देकर भेजा कि जो भी प्राणी उन्हें सबसे पहले उत्तर दिशा की ओर सिर करके लेटा हुआ मिले, उसका सिर ले आएँ। उन्हें एक हाथी का बच्चा मिला, और वे उसका सिर ले आए। शिव ने वह गजशिर बालक के धड़ पर लगाकर पुनः प्राण फूँके। इस प्रकार गजमुख धारण करने वाला वह बालक गणेश — विनायक — के नाम से विख्यात हुआ।
गणाधिपत्यम् — गणेश गणों के अधिपति कैसे बने
गजमुख धारण करके पुनर्जीवित होने के बाद, गणेश और उनके भाई कुमारस्वामी के बीच यह प्रश्न उठा कि गणों का अधिपति कौन बनेगा। देवताओं ने शिव के पास जाकर इस विषय का निर्णय करने की प्रार्थना की। शिव ने अपने दोनों पुत्रों से कहा, "तुम दोनों में से जो त्रिलोक की समस्त पवित्र नदियों में स्नान करके सबसे पहले मेरे पास लौटेगा, उसे ही यह अधिकार प्राप्त होगा।" यह सुनते ही कुमारस्वामी अपने मयूर वाहन पर सवार होकर तीव्र गति से समस्त पवित्र नदियों की यात्रा पर निकल पड़े। परंतु गणेश ने कोई शीघ्रता नहीं की। वे बस अपने माता-पिता, पार्वती और शिव के सम्मुख खड़े होकर नारायण मंत्र का जाप करते हुए उनकी परिक्रमा करने लगे। "नार का अर्थ है जल," उन्होंने समझाया, "और समस्त जल नारायण के अधीन है। अतः माता-पिता की परिक्रमा करना ही समस्त तीर्थों में स्नान करने के समान फल देता है।" उस मंत्र-शक्ति के प्रभाव से, कुमारस्वामी जिस भी नदी अथवा तीर्थ पर पहुँचते, वहाँ गणेश पहले से ही उपस्थित मिलते। जब कुमारस्वामी अपनी लंबी यात्रा पूर्ण करके थके-हारे लौटे, तो गणेश को अपने माता-पिता के समक्ष उसी स्थान पर खड़ा पाया जहाँ उन्हें छोड़ा था। उनकी बुद्धिमत्ता और भक्ति से प्रसन्न होकर शिव और पार्वती ने उन्हें उसी क्षण गणाधिपत्य प्रदान किया। तभी से यह प्रथा बनी कि कोई भी शुभ कार्य गणेश की पूजा के बिना आरंभ नहीं होता।
चंद्र परिहास — चंद्रमा का उपहास और गणेश का शाप
गणाधिपति बन चुके गणेश एक दिन समस्त देवताओं के घर भोजन करके, कुडुमुलु और उंड्रल्लु से भरपेट खाकर अपने वाहन मूषक पर स्वर्ग की ओर चल पड़े। मार्ग में अचानक एक सर्प सामने आ गया, जिससे भयभीत मूषक भाग खड़ा हुआ और गणेश भूमि पर गिर पड़े। उनके पेट में भरे हुए मिष्ठान्न बिखर गए। बिना विचलित हुए उन्होंने सब कुछ बटोरकर पुनः अपने उदर में भर लिया, और पास ही पड़े उसी सर्प को उठाकर अपनी कमर पर कमरबंद की भाँति बाँध लिया। आकाश से यह दृश्य देख रहा चंद्रमा जोर से हँस पड़ा। इस उपहास से आहत गणेश ने अपना एक दाँत तोड़कर क्रोध में चंद्रमा की ओर फेंका। "तुम अपने सौंदर्य पर इतना गर्व करते हो कि दूसरे की विपत्ति पर हँसते हो," उन्होंने कहा। "आज से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन जो भी तुम्हें देखेगा, वह मिथ्या दोषारोपण का शिकार होगा!" इस शाप से भयभीत चंद्रमा को अपनी गलती का बोध हुआ, और उसने गणेश से क्षमा माँगते हुए प्रार्थना की कि उसका तेज सदा के लिए क्षीण न हो। उसकी प्रार्थना से द्रवित होकर गणेश ने शाप को शिथिल किया — यह शाप सदा के लिए नहीं रहेगा, केवल उसी एक दिन, भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा देखने वालों पर ही लागू होगा।
स्यमंतकोपाख्यानम् — कृष्ण और सूर्य की मणि
द्वापर युग में एक बार श्रीकृष्ण ने दूध के पात्र में चंद्रमा का प्रतिबिंब देख लिया — वह दिन भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी था। उसी समय सत्राजित नामक एक यादव ने सूर्यदेव की कठोर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर सूर्य ने उन्हें स्यमंतक नामक एक दिव्य मणि प्रदान की। जो कोई इसे शुद्ध होकर धारण करता, उसे प्रतिदिन आठ भार स्वर्ण प्राप्त होता — परंतु यह मणि पवित्रता की माँग करती थी; अशुद्ध अवस्था में धारण करने वाले की मृत्यु हो जाती। सत्राजित ने वह मणि अपने भाई प्रसेनजित को दी, जो उसे गले में पहनकर आखेट हेतु वन में गया। वहाँ एक सिंह ने मणि की चमक को मांस का टुकड़ा समझकर प्रसेनजित का वध कर मणि छीन ली। जाम्बवंत नामक भल्लूकराज ने उस सिंह को मारकर मणि अपनी पुत्री जाम्बवती को खिलौने के रूप में दे दी। प्रसेनजित के न लौटने पर लोगों में यह अफवाह फैली कि मणि के लोभ में श्रीकृष्ण ने ही उसकी हत्या की है। अपने ऊपर लगे इस मिथ्या आरोप को दूर करने हेतु श्रीकृष्ण अकेले वन में निकल पड़े। उन्हें प्रसेनजित का अधखाया शरीर मिला, और सिंह के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए वे एक गुफा तक पहुँचे। भीतर एक झूले में शिशु उसी मणि से खेल रहा था। जैसे ही कृष्ण ने मणि लेनी चाही, क्रोधित जाम्बवंत युद्ध पर उतर आया। दोनों के बीच अट्ठाईस दिनों तक निरंतर घमासान युद्ध चला। अंततः थके हुए जाम्बवंत ने अपने विजेता को ध्यान से देखा और पहचान लिया — यह वही श्रीराम थे जिनकी उसने त्रेतायुग में सेवा की थी। वह कृष्ण के चरणों में गिर पड़ा, और अपनी पुत्री जाम्बवती तथा स्यमंतक मणि दोनों उन्हें भेंट कर दीं। कृष्ण द्वारका लौटे और संपूर्ण सभा के समक्ष वह मणि सत्राजित को लौटा दी, जिससे उन पर लगा मिथ्या आरोप सदा के लिए मिट गया। अपने संदेह पर लज्जित सत्राजित ने अपनी पुत्री सत्यभामा का विवाह भी कृष्ण से कर दिया। बाद में नारद ने कृष्ण को बताया कि उनके इन कष्टों का मूल कारण चतुर्थी को चंद्र-दर्शन ही था, और केवल विनायक व्रत से ही यह दोष दूर हो सकता है। कृष्ण ने पूर्ण भक्ति से यह व्रत किया और अपने ऊपर लगे समस्त आरोपों से पूर्णतः मुक्त हो गए।
नल-दमयंती — श्रद्धा और भक्ति से मिला व्रत का फल
सूत मुनि ने धर्मराज को इस व्रत की महिमा का एक और उदाहरण सुनाया। प्राचीन काल में विदर्भ की राजकुमारी दमयंती ने एक राजहंस के माध्यम से निषध नरेश नल के गुणों के बारे में सुना, और उनसे प्रेम करने लगीं। परंतु उनका यह प्रेम केवल मन की भावना मात्र नहीं था — प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को वे बिना चूके, पूर्ण श्रद्धा के साथ विनायक व्रत का पालन करती थीं। उन्हें दृढ़ विश्वास था कि यही निष्ठा उनकी हृदय-कामना को पूर्ण कर सकती है। जब उनका स्वयंवर घोषित हुआ — वह समारोह जिसमें वे स्वयं अपना पति चुनने वाली थीं — नल को भी आमंत्रित किया गया। परंतु उनके सौंदर्य और गुणों की चर्चा देवताओं तक भी पहुँच गई थी, और इंद्र, अग्नि, वरुण तथा यम — चारों देवता उन्हें पाने की इच्छा से नल का ही रूप धारण करके स्वयंवर मंडप में आ पहुँचे। जब दमयंती मंडप में पहुँचीं, तो उन्हें एक नहीं, बल्कि पाँच बिल्कुल समान नल दिखाई दिए। उस क्षण उन्होंने केवल अपने मन पर भरोसा नहीं किया — आँखें तो वैसे भी पाँचों में भेद नहीं कर पा रही थीं। इसके बजाय, वर्षों से संचित अपनी श्रद्धा और भक्ति का सहारा लेते हुए, उन्होंने मन ही मन गणेश से प्रार्थना की — "मैंने यह व्रत कभी नहीं छोड़ा। अब मेरी वही श्रद्धा ही मेरी दृष्टि बने," ऐसी प्रार्थना की। उनकी भक्ति और निष्ठा से प्रसन्न होकर देवताओं ने अपने वास्तविक स्वरूप प्रकट कर दिए — उनके पैरों की छाया नहीं पड़ती थी, उनकी आँखें कभी नहीं झपकतीं, उनकी मालाएँ कभी नहीं मुरझातीं — ऐसे दिव्य चिह्न, जो नश्वर नल में नहीं थे। इस सूक्ष्म किंतु स्पष्ट भेद को पहचानकर दमयंती ने असली नल के गले में वरमाला डाल दी। दमयंती सदैव यही मानती रहीं कि केवल उनके प्रेम ने नहीं, बल्कि वर्षों की श्रद्धा और भक्ति ने ही उनकी दृष्टि को इतना सूक्ष्म बनाया — यह प्रमाण था कि केवल इच्छा नहीं, स्थिर भक्ति ही उन्हें पार ले गई।
कथा-श्रवण का फल — धर्मराज का राज्य पुनः प्राप्त
इन सभी कथाओं को सुनाकर सूत मुनि ने धर्मराज से कहा, "हे राजन! जो कोई भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को इस विधि से गणेश की पूजा करता है, यह कथा पढ़ता या सुनता है, और सिर पर अक्षत धारण करता है, उसे भूलवश चंद्र-दर्शन होने पर भी कोई दोष नहीं लगता। जो कोई इस व्रत का प्रतिवर्ष श्रद्धापूर्वक पालन करता है, उसे — विद्यार्थी को विद्या, धन चाहने वाले को धन, संतान चाहने वाले को संतान, विवाह चाहने वाले को विवाह, और मोक्ष चाहने वाले को मोक्ष प्राप्त होता है। यह व्रत स्त्री-पुरुष, किसी भी वर्ग के लोग कर सकते हैं; गणेश की कृपा सभी पर समान रूप से बरसती है।" यह सुनकर धर्मराज ने अपने भाइयों सहित उसी वर्ष भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को विधिपूर्वक विनायक व्रत का पालन किया। उस व्रत के फलस्वरूप उन्हें धीरे-धीरे अपना खोया हुआ राज्य और संपत्ति पुनः प्राप्त हुई, और वे अपने भाइयों के साथ सुख-शांति से रहने लगे। और यह कहा जाता है कि जो कोई यह कथा पढ़ता या सुनता है, उसे भी वही आशीर्वाद प्राप्त होता है — वही वचन जो सूत मुनि ने दिया था।
मंत्रपुष्पम् एवं समापन प्रार्थना
पुष्पार्पण, परिक्रमा एवं समापन आरती से पूर्व क्षमा-याचना
( मंत्रपुष्पम् — यह श्लोक पढ़ते हुए पुष्पांजलि अर्पित करें। )
हे गणाधिप, आपको नमस्कार, हे महापाप-नाशक; ईश-पुत्र, सर्व सिद्धि प्रदाता; एकदंत, एकमुख, मूषकवाहन; कुमार के गुरु-अग्रज — आपको यह पुष्पांजलि अर्पित करता हूँ।
( क्षमापन प्रार्थना — इस जन्म एवं पूर्व जन्मों की त्रुटियों की क्षमा-याचना करते हुए, समापन आरती से पूर्व पढ़ी जाने वाली शरणागति-प्रार्थना। )
मैं पाप हूँ, मेरे कर्म पाप हैं, मेरी आत्मा पापमय है, पाप से उत्पन्न हूँ — हे देव, शरणागत-वत्सल, अपनी कृपा से मेरी रक्षा करें। मेरा कोई अन्य आश्रय नहीं; आप ही मेरे एकमात्र आश्रय हैं — अतः करुणा भाव से मेरी रक्षा करें, हे विनायक, रक्षा करें।
मंगल आरती
जयदेव जयदेव जय मङ्गलमूर्ते ।
दर्शनमात्रे मनकामना पूर्ते ॥
जय हो, हे मंगलमूर्ति — आपके दर्शन मात्र से समस्त मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं।
गणेश आरती
जय गणेश देवा — दीप जलाकर देवता के समक्ष आरती करें
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ।
माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ॥
जय हो, जय हो, जय हो गणेश देव की — जिनकी माता पार्वती और पिता महादेव हैं।
एक दन्त दयावन्त चार भुजाधारी ।
माथे पर तिलक सोहे मूसे की सवारी ॥
एकदंत, दयावान, चार भुजाओं वाले — माथे पर तिलक सुशोभित है, मूषक की सवारी करते हैं।
पान चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा ।
लड्डुअन का भोग लगे सन्त करें सेवा ॥
पान चढ़ता है, फूल चढ़ते हैं और मेवा भी चढ़ता है — लड्डुओं का भोग लगता है, संत सेवा करते हैं।
अंधन को आंख देत कोढ़िन को काया ।
बांझन को पुत्र देत निर्धन को माया ॥
अंधों को आंख देते हैं, कोढ़ियों को स्वस्थ काया देते हैं — निःसंतान को पुत्र देते हैं, निर्धन को धन देते हैं।
सूर श्याम शरण आए सफल कीजे सेवा ।
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा ॥
सूरश्याम शरण में आए हैं, उनकी सेवा सफल कीजिए — जय हो, जय हो, जय हो गणेश देव की।
उद्वासन
यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय पार्थिवीम् ।
इष्टकाम्यार्थसिद्ध्यर्थं पुनरागमनाय च ॥
समस्त देवगण इस मृण्मय पूजा को स्वीकार कर अब प्रस्थान करें — तथा इष्ट कामनाओं की सिद्धि हेतु पुनः पधारें।
गजमुख, भूतगणों द्वारा सेवित, कैथ और जामुन फल भक्षण करने वाले, उमा-पुत्र, शोक-नाशक विघ्नेश्वर के चरण-कमलों को मैं नमस्कार करता हूँ।
सुखकर्ता दुःखहर्ता वार्ता विघ्नाची ।
नुर्वी पूर्वी प्रेम कृपा जयाची ॥
सर्वांगी सुंदर उटी शेंदुराची ।
कंठी झळके माळ मुक्ताफळांची ॥
सुख देने वाले, दुःख हरने वाले, विघ्नों का समाचार रखने वाले — जिनकी प्रेम-कृपा सदा से अपार रही है। सर्वांग सुंदर, सिन्दूर से अनुलिप्त, गले में मोतियों की माला सुशोभित है।
गणपति बाप्पा मोरया ।
मंगलमूर्ती मोरया ॥
पुढच्या वर्षी लवकर या ।
( परंपरागत रूप से विसर्जन के समय समवेत स्वर में गाया जाता है, यहाँ समापन पर भी उतने ही उल्लास से गाया जा सकता है। )
हे गणपति बाप्पा, हे मंगलमूर्ति — अगले वर्ष जल्दी आना!
समापन — वायनम् दान
मंगल आरती एवं उद्वासन के पश्चात वायनम् अर्पित करने की परंपरा है — किसी पुरोहित को, या किसी वृद्ध सुहागिन स्त्री अथवा शुभचिंतक को। विधि दोनों स्थितियों में समान रहती है, परंतु भावना, सामग्री एवं संवाद प्राप्तकर्ता के अनुसार भिन्न होते हैं, जैसा नीचे दर्शाया गया है। पूजा समाप्त होने के पश्चात कलश जल एवं पसुपु गणपति का विसर्जन करें, तथा तीर्थ-प्रसाद ग्रहण करें।
पुरोहित (ब्राह्मण) को
आध्यात्मिक पुण्य, वैदिक आशीर्वाद, तथा व्रत की औपचारिक पूर्णता की कामना।
ताम्बूल (पान के पत्ते व सुपारी)
पसुपु-कुंकुम (हल्दी व सिंदूर)
कच्चा चावल, दाल, तथा सब्ज़ियाँ (स्वयंपाकम्)
फल तथा दक्षिणा
आप कहें
బ్రాహ్మణ వాయనం, శాస్త్ర వాయనం, పుణ్య వాయనం, ఇస్తినయ్యా, పుచ్చుకోండి.
"मैं यह वायनम् अर्पित करता/करती हूँ — ब्राह्मण वायनम्, शास्त्र वायनम्, पुण्य वायनम्। कृपया इसे स्वीकार करें।"
वे उत्तर दें
పుచ్చుకున్నానయ్యా వాయనం.
"मैं यह वायनम् स्वीकार करता हूँ।" वे वैदिक आशीर्वाद उच्चारित करते हुए आपके सिर पर अक्षत रखते हैं, तथा औपचारिक आशीर्वाद देते हैं।
वैकल्पिक रूप से — किसी वृद्ध सुहागिन स्त्री या शुभचिंतक को
सौभाग्य (दाम्पत्य दीर्घायु), पारिवारिक कल्याण, तथा सुमंगली स्थिति के परस्पर आशीर्वाद की कामना।
ताम्बूल (पान के पत्ते व सुपारी)
पसुपु-कुंकुम (हल्दी व सिंदूर)
ब्लाउज़-पीस या साड़ी, कांच की चूड़ियाँ, कंघी व दर्पण
भिगोया चना या गुग्गिल्लु, मिठाई व फल
उंड्रल्लु या अन्य पूजा मिष्ठान्न
1. वायनम् की थाली तैयार करें
एक थाली में दो पान के पत्ते, एक सुपारी, साबुत हल्दी, पसुपु-कुंकुम की पुड़िया, फल या मिठाई, तथा ऊपर दी गई प्राप्तकर्ता-विशेष सामग्री सजाएँ। इसे स्वच्छ वस्त्र या साड़ी के पल्लू से ढक दें।
2. संप्रोक्षण (शुद्धिकरण) करें
देवी (लक्ष्मी अथवा पार्वती) का स्मरण करते हुए वायनम् की थाली पर जल अथवा अक्षत-मिश्रित जल की कुछ बूंदें छिड़कें।
3. वायन दान संवाद का आदान-प्रदान करें
ऊपर दिए गए प्राप्तकर्ता-विशेष संवाद में से दाता की पंक्ति पढ़ें; प्राप्तकर्ता अपनी पंक्ति से उत्तर देते हैं, जिससे अर्पण औपचारिक रूप से दिया व स्वीकार किया जाता है।
4. थाली अर्पित करें और आशीर्वाद ग्रहण करें
थाली को साड़ी अथवा दुपट्टे के पल्लू से पकड़ें, नंगे हाथों से नहीं, तथा इसे प्राप्तकर्ता को अर्पित करें। उनका आशीर्वाद पाने हेतु नमस्कार करें, तथा प्रत्युत्तर में अक्षत ग्रहण करें।