लिङ्गाष्टकम् शिवलिङ्ग की स्तुति में आठ श्लोकों का स्तोत्र है, जो आदि शंकराचार्य (8वीं शताब्दी) रचित माना जाता है और मंदिरों तथा घरों में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले शैव स्तोत्रों में है। प्रत्येक श्लोक तत्प्रणमामि सदाशिव लिङ्गम् पर समाप्त होता है — ब्रह्मा और विष्णु द्वारा पूजित, चन्दन-कुंकुम से लेपित, नागराज से वेष्टित, कोटि सूर्यों सा प्रभाकर लिङ्ग। फलश्रुति शिव सन्निधि में पाठ करने वाले को शिवलोक का वचन देती है।
पूर्ण पाठ, उसी क्रम में जिसमें इसका जाप होता है। शुरू करने के लिए एक अनुभाग चुनें।
कुल 9 अंश