महालक्ष्मी अष्टकम् पद्म पुराण में मिलता है, जहाँ इसे देवराज इन्द्र ने महालक्ष्मी की स्तुति में कहा — स्तोत्र इन्द्र उवाच से आरम्भ होता है। इसके आठ श्लोक उन्हें आठ रूपों में सम्बोधित करते हैं, शंख-चक्र-गदा धारिणी से लेकर पद्मासन स्थित परब्रह्म स्वरूपिणी तक, और हर श्लोक महालक्ष्मि नमोऽस्तु ते पर समाप्त होता है। फलश्रुति बताती है कि एक, दो अथवा तीन काल पाठ करने से क्या फल कहा गया है।
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