श्री रामरक्षा स्तोत्र एक कवच है — "रक्षा-कवच" के रूप में रचा गया स्तोत्र। इसका मध्य भाग (श्लोक 4 से 9) रामायण के एक-एक कार्य से राम का नाम लेकर उसी कार्य से शरीर के एक-एक अंग की रक्षा माँगता है: शिवधनुष तोड़ने वाले भुजाओं की, सेतु बाँधने वाले घुटनों की, विभीषण को श्री देने वाले चरणों की। पंद्रहवाँ श्लोक स्वयं स्तोत्र की कथा कहता है — हर अर्थात् शिव ने इसे स्वप्न में बुधकौशिक ऋषि को सिखाया, और प्रातः जागकर उन्होंने इसे लिख लिया। अंतिम श्लोकों में कई ऐसे हैं जो अलग से भी नित्य पढ़े जाते हैं: राम नाम को संस्कृत की आठों विभक्तियों में चलाने वाला श्लोक (37), हनुमान की स्तुति मनोजवं मारुततुल्यवेगं (33), और वह श्लोक जिसमें शिव पार्वती से कहते हैं कि राम का एक नाम विष्णुसहस्रनाम के तुल्य है (38)।
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