वेङ्कटेश्वर स्तोत्रम् वे ग्यारह श्लोक हैं जो तिरुमला की प्रातःकालीन सेवा में सुप्रभातम् के पश्चात् पढ़े जाते हैं। इसके रचयिता प्रतिवादि भयंकरम् अन्नंगाचार्य हैं — 15वीं शताब्दी के श्रीवैष्णव आचार्य और मणवाल मामुनिगल के शिष्य — जिन्होंने वहाँ प्रातः पढ़ी जाने वाली पूरी शृंखला रची: सुप्रभातम्, स्तोत्रम्, प्रपत्ति और मङ्गलाशासनम्। इसका आरम्भ कमलाकुच चूचुक कुङ्कुमतो से होता है और परिणति विना वेङ्कटेशं न नाथो न नाथः में — वेङ्कटेश के बिना कोई नाथ नहीं, कोई शरण नहीं।
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