गणपती को घर लाना
उत्सव की अवधि और पहले दिन मूर्ति घर लाने की रीति
आचमन
शुद्धि हेतु जल ग्रहण, फिर हाथ जोड़कर दिव्य नामों का उच्चारण
ॐ केशवाय नमः । ॐ नारायणाय नमः । ॐ माधवाय नमः ।
( इन नामों से दो बार आचमन करें। )
( इस नाम से जल छोड़ें। आगे के नाम हाथ जोड़कर कहें, फिर प्राणायाम करें। )
ॐ गोविंदाय नमः ।
( हाथ जोड़कर उच्चारण करें। )
ॐ केशवाय नमः । ॐ नारायणाय नमः । ॐ माधवाय नमः । ॐ गोविंदाय नमः । ॐ विष्णवे नमः । ॐ मधुसूदनाय नमः । ॐ त्रिविक्रमाय नमः । ॐ वामनाय नमः । ॐ श्रीधराय नमः । ॐ हृषीकेशाय नमः । ॐ पद्मनाभाय नमः । ॐ दामोदराय नमः । ॐ संकर्षणाय नमः । ॐ वासुदेवाय नमः । ॐ प्रद्युम्नाय नमः । ॐ अनिरुद्धाय नमः । ॐ पुरुषोत्तमाय नमः । ॐ अधोक्षजाय नमः । ॐ नारसिंहाय नमः । ॐ अच्युताय नमः । ॐ जनार्दनाय नमः । ॐ उपेन्द्राय नमः । ॐ हरये नमः । ॐ श्रीकृष्णाय नमः ।
प्राणायाम
विनियोग — प्राणायाम में प्रयुक्त मंत्रों के ऋषि, देवता और छंद का कथन।
प्रणवस्य परब्रह्म ऋषिः । परमात्मा देवता । दैवी गायत्री छंदः । सप्तानां व्याहृतीनां विश्वामित्र,जमदग्नि, भरद्वाज,गौतम,अत्रि,वसिष्ठ,काश्यप ऋषयः । अग्नि, वाय्वादित्य,बृहस्पति,वरुणेन्द्र,विश्वेदेवा देवताः । गायत्र्युष्णिग् -अनुष्टप् -बृहतीपंक्ति -त्रिष्टुब - जगत्यश्छंदांसि । गायत्र्या गाथिनो विश्वामित्र ऋषिः । सविता देवता । गायत्री छंदः । गायत्री शिरसः प्रजापतिऋषिः । ब्रह्माग्निवाय्वादित्या देवताः । यजुश्छंदः । प्राणायामे विनियोगः ।
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ महः ॐ जनः ॐ तपः ॐ सत्यम् । ॐ भूर्भवः स्वः । ॐ तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात ॥ ॐ आपो ज्योती रसोऽमृतं ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम् ॥
देवतावंदन
हाथ जोड़कर शांत मन से धीरे-धीरे कहें
ॐ श्रीमन्महागणपतये नमः । इष्टदेवताभ्यो नमः । श्रीसरस्वत्यै नमः । श्री गुरुभ्यो नमः । कुलदेवताभ्यो नमः । ग्रामदेवताभ्यो नमः । स्थानदेवताभ्यो नमः । वास्तुदेवताभ्यो नमः । मातृपितृभ्यां नमः । श्रीलक्ष्मीनारायणाभ्यां नमः । सर्वेभ्यो देवेभ्यो नमः । सर्वेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नमः । निर्विघ्नमस्तु ।
सुमुखश्वैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः ॥१॥ धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचंद्रो गजाननः । द्वादशैतानि नामानि यः पठेत् शृणुयादपि ॥२॥ विद्यारंभे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा । संग्रामे संकटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥३॥
गणेश के बारह नाम: जो इन्हें पढ़ता है अथवा सुनता भी है — विद्यारंभ में, विवाह में, प्रवेश व निर्गमन में, संग्राम व संकट में — उसे विघ्न नहीं होता।
शुक्लांबरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजं । प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशांतये ॥४॥
श्वेत वस्त्रधारी, चंद्रवर्ण, चतुर्भुज, प्रसन्नमुख देव का ध्यान सर्वविघ्नों की शांति हेतु करें।
सर्वमंगलमांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरि नारायणि नमोऽस्तुते ॥५॥ सर्वदा सर्वकार्येषु नास्ति तेषाममंगलम् । येषां हृदिस्थो भगवान्मंगलायतनं हरिः ॥६॥ तदेव लग्नं सुदिनं तदेव ताराबलं चंद्रबलं तदेव । विद्याबलं दैवबलं तदेव लक्ष्मीपते तेंऽघ्रियुगं स्मरामि ॥७॥ लाभस्तेषां जयस्तेषां कुतस्तेषां पराजयः । येषामिंदीवरश्यामो हृदयस्थो जनार्दनः ॥८॥
विनायकं गुरुं भानुं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् । सरस्वतीं प्रणौम्यादौ सर्वकार्यार्थसिद्धये ॥९॥ अभीप्सितार्थसिद्धयर्थ पूजितो यः सुरासुरैः । सर्वविघ्नहरस्तस्मै गणाधिपतये नमः ॥१०॥ सर्वेष्वारब्धकार्येषु त्रयस्त्रिभुवनेश्वराः । देवा दिशन्तु न सिद्धिं ब्रह्मेशानजनार्दनाः ॥११॥ गणनाथसरस्वतीरविशुक्रबृहस्पतीन् । पंचैतानि स्मरेन्नित्यं वेदवाणीप्रवत्तये ॥१२॥
गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुः साक्षात्परब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥१३॥ यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः । तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥१४॥
गुरु ब्रह्मा हैं, गुरु विष्णु हैं, गुरु महेश्वर हैं; गुरु साक्षात् परब्रह्म हैं — उन गुरु को नमस्कार। जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर पार्थ हैं, वहाँ श्री, विजय, वैभव और स्थिर नीति है।
संकल्प
संकल्प वाक्य — रिक्त स्थान उस दिन के पंचांग से भरें
श्रीमद्भगवतो महापुरुषस्य विष्णोराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्मणो द्वियीये परार्धे विष्णुपदे श्रीश्वेतवाराहकल्पे, वैवस्वतमन्वन्तरे,कलियुगे,प्रथमचरणे,भरतवर्षे, भरतखंडे,जंबुद्वीपे,दण्डकारण्ये देशे,गोदावर्याः दक्षिणे तीरे ----मण्डले,----ग्रामे,शालिवाहन शके,---- नाम संवत्सरे,----अयने,----ऋतौ,----मासे,-----पक्षे,-----तिथौ,-------वासरे,------दिवस,----नक्षत्रे, एवंगुणविशेषणविशिष्टायां शुभपुण्यतिथौ,मम आत्मनः श्रुति स्मृति पुराणोक्त फलप्राप्त्यर्थ अस्माकं सर्वेषां सहकुटुंबानां सहपरिवाराणां क्षेम स्थैर्य विजय अभय आयुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धयर्थ शान्त्यर्थ पुष्टयर्थ तुष्टयर्थ समस्तमंगलावाप्त्यर्थ समस्तदुरितोषशांत्यर्थं समस्ताभ्युदयार्थ च इष्टकामसंसिद्धयर्थ कल्पोक्तफलावाप्त्यर्थ मम इह जन्मनि जन्मजन्मांतरे च सहकुटुंबस्य क्षेमस्थित्यायुरारोग्यैश्वर्यादिवृद्धि सर्वकामर्निर्िवघ्नसिद्धि पुत्रपौत्रधनधान्यविद्याजययशसमृद्धिद्वारा अद्य भाद्रपदशुक्लचतुथ्र्या प्रतिवार्षिकं विहितं श्रीसिद्धिविनायकदेवताप्रीत्यर्थ यथाशाक्ति यथाज्ञानेन यथामीलितोपचारद्रव्यैः ध्यानावाहनादिषोडशोपचारैः पूजां करिष्ये । तथा च आसनादि दिग्बंधादि कलशपूजनं शंखार्चनं घंटाराधनं दीपपूजनं च करिष्ये । शरिरशुद्धयर्थं षडंगन्यासं च करिष्ये । आदौ निर्विघ्नतासिद्धयर्थ श्रीमहागणपतिस्मरणं च करिष्ये ।
( जहाँ ---- चिह्न है वहाँ उस दिन के संवत्सर, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, वार और नक्षत्र के नाम पंचांग में देखकर कहें। फिर हाथ में गंधाक्षत सहित जल लेकर छोड़ें। )
श्रीमहागणपतिस्मरण
गणानांत्वा शौनकोगृत्समदो गणपतिर्जगती । गणपतिस्मरणे विनियोगः ॥
ॐ गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् । ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥
ऋद्धिसिद्धिसहितं सांगं सपरिवारं सायुधं सशक्तिकं श्रीमहागणपति स्मरामि श्रीमहागणाधिपतये नमः । निर्विघ्नं कुरु ॥
( नमस्कार करें। )
आसनशुद्धी
आसन की शुद्धि
1.पृथिवीति मंत्रस्य मेरुपृष्ठ ऋषिः कूर्मेः देवता । सुतलं छंदः । आसने विनियोगः ॥
( भूमि को स्पर्श करें। )
2.ॐ पृथ्वि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता । त्वं च धारय मां देवि पवित्रं करु चासनम् ॥
हे पृथ्वी, तुमने लोकों को धारण किया है और तुम्हें विष्णु ने धारण किया है। हे देवी, मुझे भी धारण करो और इस आसन को पवित्र करो।
3.ऊध्र्वकेशि विरूपाक्षि मांसशोणितभोजने । तिष्ठ देवि शिखाबंधे चामुंडे ह्यपराजिते ॥
भूतोत्सारण
पूजा आरंभ से पूर्व स्थान की शुद्धि
1.अपसर्पन्तु वामदेवो भूतान्यनुष्टुप भूतोत्सादने विनियोगः ।
( हाथ में अक्षत लेकर दक्षिण दिशा में फेंकें। )
2.ॐ अपसर्पन्तु ते भूता ये भूता भूमिसंस्थिताः । ये भूता विघ्नकर्तारस्ते गच्छन्तु शिवाज्ञया ॥ अपक्रामंतु भूतानि पिशाचा सर्वतो दिशम् । सर्वेषामविरोधेन पूजाकर्म समारभे ॥
3.तीक्ष्णदंष्ट्र महाकाय कल्पांतदहनोपम । भैरवाय नमस्तुभ्यमनुज्ञां दातुमर्हसि ॥ पूजाकर्म समारभै ।
4.वामपादतलपार्श्वेन भूमिं त्रिस्ताडयेत् ।
( बाएँ पैर के तलवे का भाग भूमि से तीन बार लगाएँ। )
5.देवा आयान्तु । यातुधाना अपयान्तु ॥ विष्णो देवयजनं रक्षस्व इति भूमौ प्रादेशं कूर्यात् ।
( दाहिने हाथ का अंगूठा और तर्जनी भूमि पर लगाएँ। )
6.मनुष्यगंधनिवारणे विनियोगः । येभ्यो माता इत्यस्य गयःप्लात ऋषिः,विश्वेदेवा देवता,जगती छन्दः । एवापित्र इत्यस्य वामदेवगौतम ऋषिः बृहस्पतिर्देवता, त्रिष्टुप् छन्दः ।
( गणपति को नमस्कार करें। )
षडंगन्यास
शरीरशुद्धि हेतु छह न्यास — मांडी घालकर दोनों हाथों से करें
1.अंगुष्ठाभ्यां नमः । हृदयाय नमः ।
( तर्जनी, मध्यमा और अनामिका से हृदय को स्पर्श करें। )
2.तर्जनीभ्यां नमः । शिरसे स्वाहा ।
( अंगुली और मध्यमा से मस्तक को स्पर्श करें। )
3.मध्यमाभ्यां नमः । शिखायै वषट् ॥
( तर्जनी, मध्यमा और अंगूठे से शेंडी के स्थान को स्पर्श करें। )
4.अनामिकाभ्यां नमः । कवचाय हुम् ॥
( दोनों हाथों से कंधे से नाभि तक स्पर्श करें। )
5.कनिष्ठिकाभ्यां नमः । नेत्रत्रयाय वौषट् ॥
( तर्जनी, मध्यमा और अनामिका से नेत्र और ललाट को स्पर्श करें। )
6.करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । अस्त्राय फट् । भूर्भुवस्वरोम् इति दिग्बंधः ॥
( दोनों हाथों से ताली बजाएँ। )
कलशपूजा
कलश की पूजा
कलशस्य मुखे विष्णुः कंठे रुद्रः समाश्रितः । मूले तत्र स्थितो ब्रह्माः मध्ये मातृगणाः स्मृताः ॥ कुक्षौ तु सागराः सर्वे सप्तद्वीपा वसुंधरा । ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद सामवेदो ह्यथर्वणः ॥ अंगेश्व सहिताः सर्वे कलशं तु समाश्रिताः । अत्र गायत्रीसावित्री शांतिः पुष्टिकरी तथा । आयान्तु देवपूजार्थ दुरितक्षयकारकाः ॥
( जल से भरे कलश पर गंध और अक्षत लगा हुआ फूल चिपकाएँ। )
गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन्सन्निधिं कुरु ॥ कलशाय नमः । सर्वोपचारार्थे गंधाक्षतपुष्पं समर्पयामि ।
( नमस्कार करें। )
हे गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी — इस जल में सन्निधि करो।
भारतीय संस्कृति में कलश मांगल्य का प्रतीक है और शुभ कार्य में कलश की पूजा करने की प्रथा है। कलशपूजा अर्थात् अखिल ब्रह्मांड की पूजा — कलश में सारा ब्रह्मांड समाया हुआ है। कलश के मुख में विष्णु, कंठ में शंकर, तल में ब्रह्मा और मध्य भाग में देवमाता अर्थात् मातृगण स्थित हैं। कलश में सब सागरों का पवित्र जल और सप्तखंडात्मक पृथ्वी समाविष्ट है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद — इन चारों वेदों का इसमें वास्तव्य माना गया है, अपने छह अंगों सहित। गायत्री, सावित्री — नित्य शांति और पुष्टि देने वाली देवताओं का अधिष्ठान इस कलश में है। गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु, कावेरी — इन सात नदियों का जल इसमें है। "तू ही शिव, तू ही विष्णु, तू ही ब्रह्मा — इनका प्रतीक बनी कलशरूपी ब्रह्मांडदेवते, तुझमें सारे पंचमहाभूत और प्राणशक्ति का वास्तव्य है" — ऐसी यह प्रार्थना है। कलश के बिना कोई भी पूजा नहीं होती; इसलिए यह सब कहा गया है।
शंखपूजा
शंख की पूजा
शंखादौ चंद्रदैवत्यं कुक्षौ वरुणदेवता । पृष्ठे प्रजापतिश्चैव अग्रे गंगासरस्वती ॥ त्रैलोक्ये यानि तीर्थानि वासुदेवाय चाज्ञया । शंखे तिष्ठतिं विप्रेन्द्र तस्माच्छंखं प्रपूजयेत् ॥
( शंख को स्नान कराकर गंध और पुष्प चढ़ाएँ। शंखमुद्रा दिखाकर नमस्कार करें। )
त्वं पुरा सागरोत्पन्नो विष्णुना विधृत करे । नमितः सर्वदेवेश्च पाञ्चजन्य नमोऽस्तु ते ॥ ॐ पाञ्चजन्याय विद्महे । पावमानाय धीमहि । तन्नः शंख प्रचोदयात् । शंखाय नमः । सकलपूजार्थे गंधपुष्पं समर्पयामि ॥
घंटापूजा
घंटा की पूजा
आगमनार्थे तु देवानां गमनार्थ तु रक्षसाम् । कुर्वे घंटारवं तत्र देवताऽह्वानलक्षणम् ॥ घंटायै नमः । सकलपूजार्थे गंधाक्षतपुष्पं समर्पयामि ॥
( घंटा बजाएँ। घंटे को गंध, अक्षत, फूल और हळदकुंकू अर्पित करें। )
देवताओं के आगमन हेतु और राक्षसों के गमन हेतु मैं घंटानाद करता हूँ — यह देवता के आह्वान का लक्षण है।
दीपपूजा
दीप की पूजा
भो दीप ब्रह्मरूपस्त्वं ज्योतिषां प्रभुरव्ययः । आरोग्यं देहि पुत्रांश्च सर्वार्थाश्च प्रयच्छ मे । यावत्पूजासमाप्तिः स्यात्तावत् त्वं सुस्थिरो भव । दीपदेवताभ्यो नमः । सकलपूजार्थे गंधपुष्पं समर्पयामि ॥
( समई को फूल से गंध, फूल और हळदकुंकू अर्पित करें। )
हे दीप, तुम ब्रह्मरूप हो, ज्योतियों के अव्यय प्रभु हो। आरोग्य, संतति और सब अर्थ प्रदान करो। जब तक पूजा समाप्त न हो तब तक स्थिर रहो।
प्रोक्षण
पूजा सामग्री और स्वयं पर जल छिड़कना
अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा । यः स्मरेत्पुंडरीकाक्षं स बाह्माभ्यंतरः शुचिः ॥ पूजाद्रव्याणि संप्रोक्ष्य आत्मानं च प्रोक्षयेत् ।
( दूर्वा से पूजा सामग्री पर और स्वयं पर जल छिड़कें। )
अपवित्र हो या पवित्र, अथवा किसी भी अवस्था में हो — जो पुंडरीकाक्ष का स्मरण करता है वह बाहर और भीतर से शुद्ध हो जाता है।
प्राणप्रतिष्ठा
मूर्ति में प्राण की प्रतिष्ठा — स्थापना का मुख्य अंग
प्राणप्रतिष्ठा
( दो दूर्वांकुरों से गणपति को स्पर्श करके यह कहें। )
अस्य श्रीप्राणप्रतिष्ठामंत्रस्य ब्रह्माविष्णुमहेश्वरः ऋषयः । ऋग्यजुः सामाथर्वाणि छंदासि परा प्रानशक्तिर्देवता । आं बीजम् । ह्रीं शक्तिः । क्रौं कीलकम् । अस्या मूर्तौ देवकलासन्निध्यार्थ प्राणप्रतिष्ठापने विनियोगः ।
ॐ आं,ह्रीं,क्रौं, अं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं अः क्रौं,ह्रीं,आं देवस्य प्राणा इह प्राणाः ॥ ॐ आं,ह्रीं,क्रौं, अं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं अः क्रौं,ह्रीं,आं,देवस्य जीव इह स्थितः ॥ ॐ आं,ह्रीं,क्रौं, अं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं अः क्रौं,ह्रीं,आं, देवस्यवाड्मनश्चक्षुः श्रोत्राजिव्हाघ्राणपाणिपादपायुपस्यादि सर्वेंद्रियाणि सुखं चिरं तिष्ठंतु स्वाहा ॥
ॐ असुनीते पुनरस्मासुचक्षु पुनः प्राणमिहनो धेहिभोगं । ज्योक्पश्येम सूर्यमुच्चरतमनुमते मृळयानः स्वस्ति ।
( ताम्हण में एक पळी जल दाहिने हाथ पर से छोड़ें, फिर दूर्वांकुर से गणपति के चरणों को स्पर्श करें। )
अस्य देवस्य पंचदशसंस्कारसिद्धयर्थ पंचदश प्रणवावृत्तिः करिष्ये । ॐ ॐ
( प्रणव (ॐ) का पंद्रह बार उच्चारण करें। )
( दो दूर्वांकुर घी में डुबोकर गणपति की दाहिनी आँख पर, फिर बाईं आँख पर उस दूर्वा से घी लगाएँ और यह कहें। )
ॐ तच्चक्षुर्देवहितं शुक्रमुच्चरत् । पश्येम शरदः शतं जीवेम शरदं शतम् ॥
( गणपति को हाथ जोड़कर यह कहें। फिर गणपति के चरणों पर गंध, अक्षत और फूल चढ़ाएँ, गुड़ व केले आदि का नैवेद्य दिखाएँ और नमस्कार करें। )
रक्तांभोधिस्थपोतोल्लसदरुणंसरोजधिरूढा कराब्जे । पाशं कोदण्डभिक्षूद्भवमथ गुणमप्यंकुशं पञ्चबाणान् ॥ बिभ्राणा सृक्कपालं त्रिनयनलसिता पीनवक्षोरुहाढ्या । देवी बालर्कवार्णा भवतु सुखकरी प्राणशक्तिः परा नः ॥
वंदन व ध्यान
वंदन
वक्रतुंड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ । निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा ॥
( अक्षत चढ़ाएँ। नमस्कार करें। )
हे वक्रतुंड, महाकाय, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी देव — मेरे सब कार्यों को सदा निर्विघ्न करें।
ध्यान
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥ एकदन्तं शूर्पकर्णं गजवक्त्रं चतुर्भुजम् । पाशांकुशधरं देवं ध्यायेत् सिद्धिविनायकम् ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । ध्यायामि । ध्यानं समर्पयामि ॥
( फूल और दूर्वांकुर चढ़ाएँ। नमस्कार करें। )
सिद्धिविनायक का ध्यान करें — एकदंत, शूर्पकर्ण, गजवक्त्र, चतुर्भुज, पाश और अंकुश धारण किए हुए।
षोडशोपचार पूजा
सोलह उपचार — आवाहन से अभिषेक तक
आवाहन
1.आगच्छ देवदेवेश तेजोराशे जगत्पते । क्रियामाणां मया पूजां गृहाण गणनायक ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । आवाहनार्थे दूर्वांकुरान् पुष्पांजलि समर्पयामि ॥
( आवाहन हेतु दूर्वांकुर और फूल चढ़ाएँ। नमस्कार करें। )
आसन
2.नानारत्नसमायुक्तं कार्तस्वरविभूषितम् । आसनं देवदेवेश प्रीत्यर्थ प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । आसनार्थे दूर्वांकुरान् अक्षतान् समर्पयामि ॥
( दूर्वांकुर और अक्षत गणपति के चरणों पर चढ़ाएँ। )
पाद्य
3.सर्वतीर्थसमानीतं पाद्य गन्धादिसंयुतम् । विघ्नराज गृहाणेदं भगवन् भक्तवत्सल ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । पाद्यो पाद्यं समर्पयामि ।
( गणपति के चरणों पर दूर्वांकुर से जल छिड़कें। )
पाद्य — चरण धोने का जल।
अर्घ्य
4.अध्र्ये च फलसंयुक्तं गंधपुष्पाक्षतैर्युतम् । गणाध्यक्ष नमस्तेऽस्तु गृहण करुणानिधे ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । हस्तयोः अध्र्येः समर्पयामि ॥ तदर्थे गंधाक्षतपुष्पजलं समर्पयामि ॥
( गणपति पर गंधाक्षतपुष्प चढ़ाएँ। पळी में जल लेकर उसमें गंध, अक्षत, फूल, दूर्वांकुर और सुपारी डालकर गणपति के हाथ पर अर्घ्य दें; अर्घ्य ताम्हण में छोड़ें। )
आचमन
5.विनायक नमस्तुभ्यं त्रिदशैरभिवंदित । शुद्धोदकेन तोयेन शीघ्रमाचमनं कुरु ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । आचमनीयं समर्पयामि ॥
( पळीभर जल ताम्हण में छोड़ें। )
आचमनीय।
स्नान
6.गंगादिसर्वतीर्थेभ्य आनीतं तोयमुत्तमम् । भक्त्या समर्पितं तुभ्यं स्नानायाभीष्टदायक ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । स्नानं समर्पयामि ॥
( फूल से गणपति पर थोड़ा शुद्धोदक छिड़कें। )
पंचामृत स्नान
7.पयो दधि घृतं चैव मधुशर्करया युतम् । पंचामृतेन स्नपनं क्रियतां परमेश्वर ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । पंचामृतस्नानं समर्पयामि ॥ पंचामृत स्नानातंरेण शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । सकलपूजार्थे अक्षतान् समर्पयामि ।
( पंचामृत एकत्र करके, अथवा दूध, दही, घी, मधु और शक्कर इस क्रम से अलग-अलग अर्पित करें। एकत्र हो तो यह मंत्र कहें। बीच में शुद्धोदक दें। )
दूध
8.कामधेनो समुदभूतं देवर्षिपितृतृप्तिदम् । पयो ददामि देवेश स्नानार्थ प्रतिगृह्यताम् । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । पयःस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।
दही
9.चंद्रमंडलसंकाशं सर्वदेवाप्रियं दधि । स्नानार्थ ते मया दत्तं प्रीत्यर्थ प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । दधिस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।
घी
10.आज्यं सुराणामाहार आज्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम् । आज्यं पवित्रं परमं स्नानार्थ प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । घृतस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।
मधु
11.सर्वविधिसमुत्पन्नं पीयूषसदृशं मधु । स्नानार्थ ते प्रयच्छामि गृहाण परमेश्वर ॥ श्रीसिद्धिविनायकाय नमः । मधुस्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ।
शक्कर
12.इक्षुदण्डसमुद्भूतं दिव्यशर्करया शुभम् । स्नापयामि सदा भक्त्या प्रीतो भव सुरेश्वर ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । शर्करास्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि ॥
गंधोदक स्नान
13.कर्पूरैलासमायुक्त सुगंधिद्रव्यसंयुतम् । गंधोदकं मया दत्तं स्नानार्थ प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । गंधोदकस्नानं समर्पयामि । गंधोदकस्नानंतरे शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । सकलपूजार्थे अक्षतान् समर्पयामि ।
( पळी में जल लेकर गंध डालें और वह जल चढ़ाएँ। )
मांगलिक स्नान
14.अंगोद्वर्तनकं देव कस्तुर्यादिविमिश्रितम् । स्नानार्थ ते प्रयच्छामि स्वीकुरुष्व दयानिधे ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । मांगलिक स्नानं समर्पयामि । शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । सकलपूजार्थे अक्षतान् समर्पयामि ।
( अत्तर और सुगंधी द्रव्य देव के अंग पर लगाकर स्नान कराएँ। )
पूर्वपूजा
15.श्री सिद्धिविनायकाय नमः । विलेपनार्थे चंदन समर्पयामि । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । पूजार्थे पुष्पाणि समर्पयामि । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । धूपं समर्पयामि । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । दीपं समर्पयामि । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । नैवेद्यार्थे पंचामृतशेषनैवेद्यं समर्पयामि ।
( गंध लगाएँ; फूल चढ़ाएँ; धूप दिखाएँ; नीरांजन ओवाळें; पंचामृत का शेष नैवेद्य दिखाएँ। )
पूर्वपूजा — नाममंत्रों से पंचोपचार।
16.ॐ प्राणाय स्वाहा । ॐ अपानाम स्वाहा । ॐ व्यानाय स्वाहा । ॐ उदानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा । ॐ ब्रह्माणे स्वाहा । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । उत्तरापोशनं समर्पयामि । हस्तप्रक्षालनं समर्पयामि । मुखप्रक्षालनं समर्पयामि ।
17.श्री सिद्धिविनायकाय नमः । मुखवासार्थे पूगीफलतांबूलं दक्षिणां च समर्पयामि । अनेन पूर्वाराधनेन श्री सिद्धिविनायकाः प्रीयताम् । उत्तरे निर्माल्यं विसृज्य । अथ अभेषेकं कुयात् ।
( जल छोड़ें, फिर दो विड़े के पत्ते उन पर सुपारी और दक्षिणा सहित गणपति के सामने रखकर उन पर जल छोड़ें। फिर दाहिने हाथ से पळी द्वारा ताम्हण में जल छोड़कर नमस्कार करें। गणपति पर चढ़ाए हुए फूल निकालकर उत्तर दिशा में रखें और अभिषेक करें। )
अभिषेक
18.ॐ भूर्भुवः स्वः अमृताभिषेकोऽस्तु । शांतिः पुष्टिस्तुष्टिश्चास्तु ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । महाअभिषेकस्नानं समर्पयामि । महाअभिषेक स्नानानंतरे शुद्धोदकस्नानं समर्पयामि । सकलपूजार्थे अक्षतान् समर्पयामि ॥
( गणपति पर फूल या दूर्वांकुर से जल छिड़कें। )
19.गृहा वै प्रतिष्ठासूक्तं तत्प्रतिष्ठिततमया वाचा शंस्तव्यं तस्माद्यद्यपि दूर इव पशूंल्लभते । गृहानेवैनानाजिगमिषति गृहा हि पशूनां प्रतिष्ठा प्रतिष्ठा ॥ सुप्रतिष्ठितमस्तु । सुमुहूर्तमस्तु ॥
वस्त्र व अलंकार
वस्त्र, यज्ञोपवीत, चंदन, अक्षत, सिंदूर और आभूषण
वस्त्र
1.सर्वभूषाधिके सौम्ये लोकलज्जानिवारणे । पयोपपादिते तुभ्यं वाससी प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । वस्त्रोपवस्त्रे समर्पयामि ।
( गणपति को कापसाची वस्त्रे (सूत के वस्त्र) चढ़ाएँ। )
यज्ञोपवीत
2.देवदेव नमस्तेऽस्तु त्राहि मां भवसागरात् । ब्रह्मसूत्रं सोत्तरीयं गृहाण पुरुषोत्तम ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । उपवस्त्रारर्थे यज्ञोपवीतं समर्पयामि ।
( गणपति को जानवे घालावे (यज्ञोपवीत पहनाएँ)। )
जानवे (यज्ञोपवीत)।
तांबडे गंध
3.श्रीखंड चंदनं दिव्यं गंधाढ्यं सुमनोहरम् । विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दनं प्रतिगृह्यताम् । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । चन्दनं समर्पयामि ।
( गणपति को तांबडे गंध लगाएँ। )
अक्षता
4.रक्ताक्षतांश्च देवेश गृहाण द्विरदानन । ललाटपटले चन्द्रस्तस्योपरि विधार्यताम् ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । अक्षतान् समर्पयामि ।
( गणपति को कुंकुमाक्षता चढ़ाएँ। )
सिंदूर
5.उदितारुणसंकाशं जपाकुसुमसंनिभम् । सीमंतभूषणार्थाय सिंदूरं प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । सिंदूरं समर्पयामि ।
( गणपति को शेंदूर लगाएँ। )
अलंकार
6.अनेकरत्नयुक्तानि भूषणानि बहूनि च । तत्तदंगे योजयामि कांचनानि तवाज्ञया ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । नानाभूषणानि समर्पयामि ।
( गणपति के अंगों पर आभूषण पहनाएँ। फिर ऋद्धिसिद्धि को हळद, कुंकू, काजळ, सिंदूर, मंगलसूत्र, कंकणे क्रम से चढ़ाएँ। )
हल्दी
7.हरिद्रा स्वर्णवर्णाभा सर्वसौभाग्यदायिनी । सर्वालंकारमुख्या हि देवि त्वं प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री ऋद्धिसिद्धिभ्यां नमः । हरिद्रां समर्पयामि ।
हळद — ऋद्धिसिद्धि को।
कुंकुम
8.हरिद्राचूर्णसंयुक्तं कुंकुमं कामदायकम् । वस्त्रालंकरणं सर्व देवि त्वं प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री ऋद्धिसिद्धिभ्यां नमः । कुंकुमं समर्पयामि ।
कुंकू — ऋद्धिसिद्धि को।
काजल
9.कज्जलं कामिकं रम्य कामिनीकामसंभवम् । नेत्रयोर्भूषणार्थाय कज्जलं प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री ऋद्धिसिद्धिभ्यां नमः । कज्जलं समर्पयामि ।
काजळ — ऋद्धिसिद्धि को।
सिंदूर
10.उदितारुणसंकाशं जपाकुसुमसन्निभम् । सीमंतभूषणार्थाय सिंदूरं प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री ऋद्धिसिद्धिभ्यां नमः । सिंदूरं समर्पयामि ।
सिंदूर — ऋद्धिसिद्धि को।
मंगलसूत्र
11.मांगल्यतंतुमणिभिर्मुक्ताफलविराजितम् । कण्ठस्य भूषणार्थाय कण्ठसूत्रं प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री ऋद्धिसिद्धिभ्यां नमः । कंठसूत्रं समर्पयामि ।
मंगलसूत्र — ऋद्धिसिद्धि को।
कंकण
12.काचस्य निर्मितं दिव्यं कंकणं च सुरेश्वरि । हस्तालंकरणार्थाय कंकणं प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री ऋद्धिसिद्धिभ्यां नमः । कंकणं समर्पयामि ।
कंकण — ऋद्धिसिद्धि को।
परिमलद्रव्य
13.ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते विश्वरूपिणे नानापरिमलद्रव्यं गृहाण परमेश्वर ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । नानापरिमलसुवासिकद्रव्याणि समर्पयामि ।
( गणपति को अष्टगंध, अत्तर इत्यादि परिमलद्रव्य चढ़ाएँ। )
परिमलद्रव्ये।
पुष्पे, शमीपत्र व दूर्वा
फूल, शमीपत्र, और दस नाममंत्रों सहित दूर्वा
पुष्प
1.माल्यादीनि सुंगधीनि मालत्यादीनि वै प्रभो । मया हृतानि पूजार्थे पुष्पाणि प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । नानापुष्पाणि समर्पयामि ।
( गणपति को तांबडी फुले चढ़ाएँ। )
पुष्पे।
शमीपत्र
2.ॐ स इंद्राय वचोयुजा ततक्षुर्मनसाहारि । शमीभिर्यज्ञमाशत । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । शमीपत्राणि समर्पयामि ।
( गणपति को शमीपत्रे चढ़ाएँ। )
दूर्वा
3.कांडात्काण्डात्प्ररोहन्ति परुषः परुषः परि । एवानो दूर्वे प्रतनू सहस्रेण शतेन च ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । दूर्वांकुरान् समर्पयामि ।
( गणपति को दूर्वा चढ़ाएँ, अग्रभाग अपनी ओर रखें। फिर आगे के मंत्रों से गंधाक्षतासहित दूर्वा चढ़ाएँ। )
4.ॐ गणाधिपाय नमः । दूर्वायुग्मं समर्पयामि । ॐ उमापुत्राय नमः । दूर्वायुग्मं समर्पयामि । ॐ अघनाशनाय नमः । दुर्वायुग्मं समर्पयामि । ॐ विनायकाय नमः । दुर्वायुग्मं समर्पयामि । ॐ ईशपुत्राय नमः । दूर्वायुग्मं समर्पयामि । ॐ सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः । दूर्वायुग्मं समर्पयामि । ॐ एकदन्ताय नमः । दूर्वायुग्मं समर्पयामि । ॐ इभवक्त्राय नमः । दूर्वायुग्मं समर्पयामि । ॐ मूषकवाहनाय नमः । दूर्वायुग्मं समर्पयामि । ॐ कुमारगुरवे नमः । दूर्वायुग्मं समर्पयामि ।
दस नाममंत्र, प्रत्येक के साथ दूर्वायुग्म।
5.ॐ गणाधिप नमस्तेऽस्तु उमापुत्राघनाशन । विनायकेशपुत्रेति सर्वसिद्धिप्रदायक ॥ एकदन्तेभवक्त्रेति तथा मूषकवाहन । कुमारगुरवे तुभ्यं पूजयामि प्रयत्नः । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । एकं दूर्वा समर्पयामि ।
( गणपति को इक्कीस दूर्वांची जुडी चढ़ाएँ। )
एकवीस नाममंत्र
प्रत्येक नाम के साथ कुंकुमाक्षता चढ़ाएँ
अंगपूजा
प्रत्येक नाममंत्र बोलकर उस-उस अंग पर दूर्वा या कुंकुमाक्षता चढ़ाएँ
पत्रीपूजा
प्रत्येक नाममंत्र से एक-एक पत्री चढ़ाएँ
धूप, दीप व नैवेद्य
धूप, दीप, नैवेद्य, तांबूल, फळे और महादक्षिणा
धूप
1.वनस्पतिरसोद्भूतो गंधाढ्यो गंध उत्तमः । आघ्रेयः सर्वदेवानां धूपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । धुप समर्पयामि ।
( गणपति को धूपारती या उदबत्ती से ओवाळावे। )
दीप
2.आज्यं च वर्तिसंयुक्तं वह्विना योजितं मया । दीपं गृहाण देवेश ममाज्ञानं निवारय ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । दिपं समर्पयामि ।
( नीरांजन से पैरों से मस्तक तक घंटा बजाते हुए ओवाळावे। )
नैवेद्य
3.नैवेद्य गृह्यतां देव भक्ति मे ह्यचलां कुरु । ईत्सितं मे वरं देहि परत्र च परां गतिम् ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । नैवेद्यं समर्पयामि ।
( गुड़, खोबरे, मोदक आदि जो नैवेद्य अर्पित करना हो वह पात्र में रखकर उस पर तुलसीपत्र डालें, पात्र के नीचे जल से चौकोन मंडल बनाएँ और इस मंत्र से अर्पित करें। जो पदार्थ हो उसका नाम लें, जैसे गुडखाद्यनैवेद्यं, मोदकनैवेद्यम्। )
4.ॐ प्राणाय स्वाहा । ॐ अपानाय स्वाहा । ॐ व्यानाय स्वाहा । ॐ उदानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा । ॐ ब्रह्मणे स्वाहा । उत्तरापोशनं समर्पयामि । मुखप्रक्षालनं समर्पयामि । हस्तप्रक्षालनं समर्पयामि । आचमनं समर्पयामि । करोद्वर्तनार्थे चंदनं समर्पयामि ।
( प्राण मंत्र कहकर एक पळी जल ताम्हण में छोड़ें, फिर दोहराकर तीन पळी जल छोड़ें। फूल को गंधाक्षता लगाकर गणपति को अर्पित करें। )
तांबूल
5.पूगीफलं महद्दिव्यं नागवल्लीदलैर्युतम् । कर्पूरैलासमायुक्तं तांबुल प्रतिगृह्यताम् ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । पूगीफल -तांबूलं समर्पयामि ।
( गणपति के सामने विडा व सुपारी रखकर दाहिने हाथ से एक पळी जल उन पर छोड़ें। )
फल
6.फलेन फलितं सर्वं त्रैलोक्यं सचराचरम् । तस्मात् फलप्रदानेन सफलाश्च मनोरथाः ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । विविध-फलानि समर्पयामि ।
( गणपति के सामने यथाप्राप्त फल रखकर एक पळी जल छोड़ें। )
फळे।
महादक्षिणा
7.हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमबीजं विभावसोः । अनंतपुण्यफलदमतः शांतिं प्रयच्छ मे ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । महादक्षिणां समर्पयामि ।
( गणपति के सामने यथाशक्ति महादक्षिणा रखकर उस पर जल छोड़ें। )
नीरांजन व आरती
नीरांजन, कापुरारती, प्रदक्षिणा और साष्टांग नमस्कार
नीरांजन
1.चंद्रादित्यौ च धरणिर्विद्युदग्निस्तथैव च । त्वमेव सर्वज्योतीषि आर्तिक्यं प्रतिगृह्यताम् ॥ कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारं भुजगेंद्रहारम् । सदा वसन्तं हृदयारविंद भवं भवानीसहितं नमामि । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । महानीरांजनदीपं समर्पयामि ।
( गणपति को नीरांजन से ओवाळावे। )
कर्पूर आरती
2.कर्पूरपूरेण मनोहरेण सुवर्णपात्रोदरसंस्थितेन । प्रदिप्तभासा सह संगतेन नीरांजन ते जगदीश कुर्वे ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । कर्पूरार्तिक्यदीपं समर्पयामि ।
( कापूर प्रदीप्त करके ओवाळावा। नमस्कार करें। )
कापुरारती।
प्रदक्षिणा
3.यानि कानि च पापनि जन्मांतरकृतानि च । तानि तानि विनश्यन्ति प्रदक्षिण पदे पदे ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । प्रदक्षिणां समर्पयामि ।
( हाथ जोड़कर स्वयं के चारों ओर दाएँ से बाएँ घूमें। )
साष्टांग नमस्कार
4.नमः सर्वहितार्थाय जगदाधारहेतवे । सांष्टांगोऽयं प्रणामस्ते प्रयत्नेन मया कृतः । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । नमस्कारान् समर्पयामि ।
( साष्टांग नमस्कार करें। )
पुष्पांजलि
5.नमस्ते विघ्नसंहर्त्रे नमस्ते ईप्सितप्रद । नमस्ते देवदेवेश नमस्ते गणनायक ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । मंत्रपुष्पं समर्पयामि ।
( गंध, अक्षतासहित फूल लेकर गणपति के चरणों पर चढ़ाएँ। )
पुष्पांजली।
अध्र्यप्रदान व प्रार्थना
तीन अर्घ्य और पूजा का समापन करने वाली प्रार्थना
अर्घ्यप्रदान
पूजाफलाप्राप्त्यर्थ अघ्र्यप्रदानं करिष्ये ।
( ऐसा कहकर दाहिने हाथ में कुछ सिक्के, सुपारी, दो दूर्वा, गंध, अक्षत और फूल लेकर उन पर जल डालें और सारा अर्घ्य नीचे छोड़ें। ऐसा तीन बार करें। )
नमस्ते देवदेवेश नमस्ते विघ्ननाशक । नमो भक्तानुकं देव गृहाणाघ्र्यं नमोस्तु ते ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । इदमघ्र्य दत्तं न मम ।
गणेशाय नमस्तुभ्यं सर्वकामफलप्रद । वाञ्छितं देहि मे नित्यं गृहाणाघ्र्यं नमोस्तु ते ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । इदमघ्र्यं दत्तं न मम ।
व्रतमुद्दिश्य देवेश गन्धपुष्पाक्षतैर्युतम् । अध्र्य गृहाण देवेश मम सौख्यं विवर्धय ॥ श्री सिद्धिविनायकाय नमः । इदमघ्र्यं दत्तं न मम ।
प्रार्थना
विनायक गणेशाय सर्वदेव नमस्कृत । पार्वतीप्रिय विघ्नेश मम विघ्नविनाशय ॥ नमो नमो विघ्नविनाशनाय नमो नमस्त्राहि कृपाकराय । नमोस्तुतऽभीष्टवरप्रदाय तस्मै गणेशाय नमो नमस्ते ॥ मंगलमूर्ति मोरया । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । प्रार्थना समर्पयामि ।
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या तपः पूजाक्रियादिषु । न्यूनं संपूर्णतां याति सद्यो वंदे तमच्युतम् ॥ मंत्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वर । यत्पूजितं मया देव परिपूर्ण तदस्तु मे ॥ रूपं देही जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि । पुत्रान्देहि धनं देहि सर्वकामांश्च देहि मे ॥
( नमस्कार करें। )
मंत्र, क्रिया अथवा भक्ति में जो न्यूनता रही वह पूर्ण हो, यह प्रार्थना।
अनेन यथाज्ञानेन यथामीलितोपचारद्रव्यैः । कृतपूजनेन श्री भगवान गणपतिः प्रीयताम् । ॐ तत्सत् ब्रह्मार्पणमस्तु ॥
( पूजा समाप्ति का उदक छोड़ें और नमस्कार करें। फिर आरत्या कहें। मंत्रपुष्पांजली के बाद गणेश गायत्री मंत्र कहें। )
ॐ एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंडाय धीमहि । तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥
गणेश गायत्री मंत्र।
तीर्थग्रहण व ब्राह्मणपूजा
तीर्थ ग्रहण, और ब्राह्मण के नाम से किया जाने वाला अर्पण
तीर्थग्रहण
अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम् । देवपादोदकं तीर्थ जठरे धारयाम्यहम् ॥
( अभिषेक और पंचामृतस्नान का तीर्थ एक पळीभर प्राशन करें। )
अकाल मृत्यु का हरण और सर्व व्याधियों का नाश करने वाला देवचरणोदक तीर्थ मैं उदर में धारण करता हूँ।
ब्राह्मणपूजा
( गणेश चतुर्थी के दिन अपना गणपति स्वयं बिठाया हो तब भी ब्राह्मण के नाम से विडा, नारळ, महादक्षिणा निकालकर रखें; उन पर गंध, अक्षत, फूल चढ़ाकर यह कहें। फिर वह ब्राह्मण को देकर आएँ। पूजा कहने के लिए ब्राह्मण आया हो तो सम्मानपूर्वक उसकी पूजा करें: उसके हाथ पर गंध, अक्षत, फूल, विडा और महादक्षिणा देकर उदक छोड़ें; उसके मस्तक पर अक्षत अर्पित कर आशीर्वाद लें — "श्रेयः शांतिः पुष्टिस्तुष्टिश्वास्तु । शुभं भवतु ॥" )
नमोऽस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्रपादक्षिशिरोरुबाहवे । सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते सहस्रकोटियुगधारणे नमः ॥
उत्तरपूजा व विसर्जन
अनंत चतुर्दशी को, विसर्जन से पूर्व की विदाई पूजा
उत्तरपूजा
श्री सिद्धिविनायकप्रीत्यर्थ पंचोपचारैः उत्तरपूजनं करिष्ये ।
( विसर्जन के दिन शुचिर्भूत होकर कपाल पर कुंकू लगाएँ, आसन पर बैठें और यह संकल्प करें। फिर पंचोपचारों से पूजा करें। )
श्री सिद्धिविनायकाय नमः । विलेपनार्थे चंदनं समर्पयामि । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । पुष्पाणी समर्पयामि । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । धूपं समर्पयामि । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । दीपं समर्पयामि । श्री सिद्धिविनायकाय नमः । नैवेद्यं समर्पयामि ।
( गंध; फुले; उदबत्ती ओवाळावी; नीरांजन ओवाळावी; नैवेद्य दाखवावा। विडा, दक्षिणा ठेवावी। नारळ फोडावा। )
पंचोपचार — चंदन, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य।
यांतु देवगणाः सर्वे पुजामादाय पार्थिवीम् । इष्टकामप्रसिद्धयर्थ पुनरागमनाय च ॥
( इस मंत्र से "मंगलमूर्ती मोरया" के नामघोष सहित मूर्ति पर अक्षता वाहाव्या। सर्व मंडळी के कल्याण के लिए मागणे करें। )
सभी देवगण इस पार्थिव पूजा को स्वीकार कर जाएँ — इष्ट की सिद्धि हेतु, और पुनः आगमन हेतु।
अनेन उत्तरपूजनेन श्री सिद्धिविनायकः प्रीयताम् ।
( उदक छोड़ें। फिर आरत्या कहें। सब गणपति पर गंधपुष्प चढ़ाएँ और नमस्कार करें। विसर्जन की अक्षता घालाव्या, मूर्ति जरा सरकवावी, और सब मिलकर वाजतगाजत विसर्जन करें। )
( गणपति का जयजयकार करें। )
मंगलमूर्ती मोरया! गणपती बाप्पा मोरया! अगले वर्ष जल्दी आइए!
मंगलमूर्ती मोरया । गणपती बाप्पा मोरया । पुढच्या वर्षी लवकर या ।