Subhashita Ratna BhandagaraAnushtubh
अकस्माद्द्वेष्टि यो भक्तम् आजन्मपरिसेवितम् । न व्यञ्जने रुचिर्यस्य त्याज्यो नृप इवातुरः ॥
अकस्मात्अचानक
द्वेष्टिद्वेष करता है
यःजो
भक्तम्भक्त
आजन्मजन्म से
परिसेवितम्सेवा करने वाला
ननहीं
व्यञ्जनेभोजन में
रुचिःरुचि / स्वाद
यस्यजिसका
त्याज्यःछोड़ देना चाहिए
नृपःराजा
इवजैसे
आतुरःअसाध्य रोगी
जो जन्म से सेवा करने वाले भक्त से अचानक द्वेष करने लगे, जैसे रोगी भोजन का स्वाद खो देता है, ऐसे राजा को असाध्य रोगी की तरह छोड़ देना चाहिए।
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