अतितृष्णा न कर्तव्या

Subhashitam

अतितृष्णा न कर्तव्या तृष्णां नैव परित्यजेत् । शनैः शनैश्च भोक्तव्यं स्वयं वित्तमुपार्जितम् ॥

अतितृष्णाअति तृष्णा
तृष्णाम्तृष्णा
ननहीं
परित्यजेत्त्याग करना चाहिए
शनैः शनैःधीरे-धीरे
भोक्तव्यम्भोगना चाहिए
उपार्जितम्अर्जित

अति तृष्णा नहीं करनी चाहिए, परन्तु तृष्णा का पूर्ण त्याग भी नहीं। स्वयं अर्जित धन को धीरे-धीरे, मध्यम मार्ग से भोगना चाहिए।

detachmentdisciplineself-reliancewisdom

हर सुबह एक संस्कृत श्लोक, अर्थ सहित — अपने ईमेल पर।

मुफ़्त। हर दिन एक श्लोक। कभी भी अनसब्सक्राइब करें।

हम केवल श्लोक भेजेंगे। कोई स्पैम नहीं, कोई साझा नहीं।