रत्नैर्महार्हैस्तुतुषुर्न देवाः

Subhashitam

रत्नैर्महार्हैस्तुतुषुर्न देवाः न भेजिरे भीमविषेण भीतिम् । अमृतं विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः ॥

रत्नैःरत्नों से
महार्हैःबहुमूल्य
तुतुषुःसन्तुष्ट हुए
भीमविषेणभयानक विष से
अमृतम्अमृत
विरामम्विराम
निश्चितार्थात्निश्चित लक्ष्य से
धीराःधीर पुरुष

समुद्र-मन्थन में देवता बहुमूल्य रत्न पाकर भी सन्तुष्ट नहीं हुए, और भयानक विष से भी भयभीत नहीं हुए। अमृत प्राप्त किये बिना वे रुके नहीं। धीर पुरुष भी अपने निश्चित लक्ष्य से विराम नहीं लेते।

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