SubhashitamIndravajra
रत्नैर्महार्हैस्तुतुषुर्न देवाः न भेजिरे भीमविषेण भीतिम् । अमृतं विना न प्रययुर्विरामं न निश्चितार्थाद्विरमन्ति धीराः ॥
समुद्र-मन्थन में देवता बहुमूल्य रत्न पाकर भी सन्तुष्ट नहीं हुए, और भयानक विष से भी भयभीत नहीं हुए। अमृत प्राप्त किये बिना वे रुके नहीं — धीर पुरुष भी अपने निश्चित लक्ष्य से विराम नहीं लेते।
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