अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च

Bhagavad Gita4.40

अज्ञश्चाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति । नायं लोकोऽस्ति न परो न सुखं संशयात्मनः ॥

अज्ञःअज्ञानी
चऔर
अश्रद्दधानःश्रद्धाहीन
चऔर
संशयात्मासन्देह से भरा व्यक्ति
विनश्यतिनष्ट हो जाता है
ननहीं
अयम्यह
लोकःलोक
अस्तिहै
ननहीं
परःपरलोक
ननहीं
सुखम्सुख
संशयात्मनःसन्देही का

अज्ञानी, श्रद्धाहीन और सन्देह से भरा व्यक्ति नष्ट हो जाता है। सन्देही के लिए न यह लोक है, न परलोक, और न ही सुख।

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