अकृतप्रेमैव वरं

अकृतप्रेमैव वरं न पुनः सञ्जातविघटितप्रेमा । उद्धृतनयनस्ताम्यति यथा हि न तथेह जातान्धः ॥

अकृतप्रेमप्रेम जो हुआ ही न हो
एवही
वरम्अच्छा / श्रेयस्कर
न पुनःइसके बजाय नहीं
सञ्जातउत्पन्न हुआ
विघटितटूटा हुआ
प्रेमाप्रेम
उद्धृतनिकाला हुआ
नयनःआँख वाला
ताम्यतिकष्ट पाता है
यथाजैसे
हिनिश्चय ही
न तथावैसे नहीं
इहयहाँ / इस लोक में
जातान्धःजन्म से अन्धा

प्रेम न हुआ हो तो अच्छा, बजाय इसके कि प्रेम हो और फिर टूट जाए, जैसे जन्म से अन्धे को उतना कष्ट नहीं होता जितना उसे होता है जिसकी आँखें निकाल ली जाएँ।

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