अकृतप्रेमैव वरं न पुनः सञ्जातविघटितप्रेमा । उद्धृतनयनस्ताम्यति यथा हि न तथेह जातान्धः ॥
प्रेम न हुआ हो तो अच्छा, बजाय इसके कि प्रेम हो और फिर टूट जाए — जैसे जन्म से अन्धे को उतना कष्ट नहीं होता जितना उसे होता है जिसकी आँखें निकाल ली जाएँ।
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अकृतप्रेमैव वरं न पुनः सञ्जातविघटितप्रेमा । उद्धृतनयनस्ताम्यति यथा हि न तथेह जातान्धः ॥
प्रेम न हुआ हो तो अच्छा, बजाय इसके कि प्रेम हो और फिर टूट जाए — जैसे जन्म से अन्धे को उतना कष्ट नहीं होता जितना उसे होता है जिसकी आँखें निकाल ली जाएँ।
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