धारणात् धर्म इत्याहुः

MahabharataKarṇa Parva 8.49.50; Śānti Parva 12.110.11

धारणात् धर्म इत्याहुः धर्मो धारयति प्रजाः । यत्स्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः ॥

धारणात्धारण करने से
धर्मःधर्म
इतिऐसा
आहुःकहते हैं
धारयतिधारण करता है
प्रजाःप्रजा
यत्जो भी
स्यात्हो
धारणधारण करना
संयुक्तम्से युक्त
सःवही
धर्मःधर्म है
इतिऐसा
निश्चयःनिश्चित रूप से

जो एकता में बाँधता है उसे धर्म कहते हैं। धर्म प्रजा को धारण करता है। जिसमें सबको जोड़ने की शक्ति हो, वही निश्चित रूप से धर्म है।

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