कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥
जनक आदि ने कर्म द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की थी। लोक-कल्याण को ध्यान में रखते हुए भी तुम्हें कर्म करना चाहिए।
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कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः । लोकसंग्रहमेवापि सम्पश्यन्कर्तुमर्हसि ॥
जनक आदि ने कर्म द्वारा ही सिद्धि प्राप्त की थी। लोक-कल्याण को ध्यान में रखते हुए भी तुम्हें कर्म करना चाहिए।
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