संरोहत्यग्निना दग्धं

Mahabharata13.161.34

संरोहत्यग्निना दग्धं वनं परशुना हतम् । वाचा दुरुक्तं बीभत्सं न संरोहति वाक्क्षतम् ॥

संरोहतिफिर उग आता है
अग्निनाआग से
दग्धम्जला हुआ
परशुनाकुल्हाड़ी से
दुरुक्तम्दुर्वचन
बीभत्सम्भयंकर
वाक्क्षतम्वाक्-क्षत

आग से जला या कुल्हाड़ी से कटा वन फिर उग आता है; परन्तु दुर्वचनों से दिया गया भयंकर वाक्-क्षत कभी नहीं भरता। (भीष्म का युधिष्ठिर को उपदेश)

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