विकृतिं नैव गच्छन्ति

Subhashitam

विकृतिं नैव गच्छन्ति सङ्गदोषेण साधवः । आवेष्टितं महासर्पैः चन्दनं न विषायते ॥

विकृतिम्विकार
साधवःसाधु पुरुष
सङ्गदोषेणसंगति के दोष से
आवेष्टितम्लिपटा हुआ
महासर्पैःमहासर्पों से
चन्दनम्चन्दन
ननहीं
विषायतेविष-युक्त बनता है

साधु पुरुष संगति के दोष से विकार को प्राप्त नहीं होते, जैसे महासर्पों से लिपटा हुआ चन्दन भी विष-युक्त नहीं बनता।

virtuousbad companysteadfastnesssandalwood

हर सुबह एक संस्कृत श्लोक, अर्थ सहित — अपने ईमेल पर।

मुफ़्त। हर दिन एक श्लोक। कभी भी अनसब्सक्राइब करें।

हम केवल श्लोक भेजेंगे। कोई स्पैम नहीं, कोई साझा नहीं।