विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा

Bhartrihari Nitishatakam

विपदि धैर्यमथाभ्युदये क्षमा सदसि वाक्पटुता युधि विक्रमः । यशसि चाभिरुचिर्व्यसनं श्रुतौ प्रकृतिसिद्धमिदं हि महात्मनाम् ॥

विपदिविपत्ति में
धैर्यम्धैर्य
अथऔर / पुनः
अभ्युदयेसमृद्धि में
क्षमाक्षमा
सदसिसभा में
वाक्पटुतावाक्पटुता
युधियुद्ध में
विक्रमःपराक्रम
यशसियश में
चऔर
अभिरुचिःअनुराग / चाह
व्यसनम्व्यसन / लगन
श्रुतौशास्त्रों में
प्रकृतिसिद्धम्स्वाभाविक / प्रकृति से सिद्ध
इदम्यह
हिनिश्चय ही
महात्मनाम्महात्माओं के

विपत्ति में धैर्य, समृद्धि में क्षमा, सभा में वाक्पटुता, युद्ध में पराक्रम, यश की चाह और शास्त्रों में अनुराग, ये महात्माओं के स्वाभाविक गुण हैं।

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