वज्रादपि कठोराणि

वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि । लोकोत्तराणां चेतांसि को हि विज्ञातुमर्हति ॥

वज्रात्वज्र से
कठोराणिकठोर
मृदूनिकोमल
कुसुमात्फूल से
लोकोत्तराणाम्लोकोत्तर महापुरुषों के
चेतांसिचित्त
विज्ञातुम्जानने में

लोकोत्तर महापुरुषों के चित्त वज्र से भी कठोर और फूल से भी कोमल होते हैं। उन्हें कौन जान सकता है? (भवभूति, उत्तररामचरित)

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